आप बीती
जुलाई माह आ गया था इस बार मेघराज कुछ देर से प्रथ्विवासियो पर अपनी किरपा द्रष्टि प्रदान रहे थे, उमस, गर्मी से बुरा हाल था प्रथ्वी से भी गरम वाष्प निकल रही थी प्यास से गला सुख रहा था रुक रुक के दो चार बूंदों के छींटे आसमान से गिर रहे थे और गर्म तवे पर पड़ने वाली पानी कि बूंदों से जो वैज्ञानिक प्रक्रिया होती है प्रथ्वी पर बादल वही प्रक्रिया दोहरा रहे थे और ऐसे में मेघराज कुछ ऐसे लग रहे थे जैसे की किसी गठबंधन वाली सरकार के साथ प्रत्यछ रूप से जुडी छोटा राजनीतिक दल, बात न बात अपनी उपस्थिति उनमे दर्ज करा रहे थे पर पूर्ण रूप से सामने भी न आ रहे थे और पीछे भी न जा रहे थे अब जब समय आया तो काफी मान मनोव्वल के बाद जैसे वो राजी हुए और थोड़ी सी किरपा उन्होंने इस धरती पर आज की थी, जैसे कह रहे हो की ए० सी० लगा लगा कर तुम लोगो ने ग्लोबल वार्मिंग तो बढ़ा ही दी है अब मेरी क्या जरुरत, अब अमीरों को अपने व्यक्तिगत वातानूकुलित कक्ष और माध्यम वर्ग को बी.पि. ओ के वातानूकुलित सयंत्र की आदत पड़ गई है तो मेरी क्या आवश्यकता, तो एक प्रश्...