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हद

क्यों  क्या सो गए हो कायर तो नहीं हो फिर क्यों आज यहाँ नहीं हो क्यंकि जब दर्द हद से गुजर जाता है तो दवा बन जाता है क्या तेरे आने की अभी हद नहीं आई अरे अब तो चल उठ समय बड़ा विकट है सिर्फ मेरा ही नहीं प्रश्न ये प्रश्न सबके निकट है समय आज ऐसा है की अब रुकना मुश्किल है  एक वो भी था के जब रुकना मुश्किल था न तब रुके थे लोग हँसते हंसते लड़े थे इस पाप इस अत्याचार से जम जम के लड़े थे न तब रुके थे लोग न अब रुकेंगे लोग न  कर इन्तजार अब किसी चमत्कार का अपने मरे बिना स्वर्ग नहीं मिला किसी को और कितनी हद चाहता है और कितनी जद चाहता है

उलझन

न जाने क्यों  मैं विवश   हूँ  आत्मपीड़ा सह रहा हूँ  दुविधा  में पड़ा  क्यों सह रहा हूँ ये व्यर्थ का बोझ | नाराश्य  में ही जाने क्यों सोचता है ये मन  कभी इस  ओर कभी उस ओर  गमन करता है  इसी  दुविधा में लगा हूँ   रहा हूँ अपने  प्रश्नों का उत्तर खोज  | मन जाने न जाने  या जाने कभी भी चला जाता हूँ    इस मार्ग कभी उस मार्ग मन को न समझा पाता  हूँ  न  मन को समझ पाता हूँ ||