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आदिकालीन साहित्य सामग्री

आदिकालीन साहित्य को प्राप्त साहित्य के आधार पर निम्नं भागो में बनता जा सकता है | १. धार्मिक साहित्य  ( जैन साहित्य , सिद्ध साहित्य , नाथ साहित्य ) २. लौकिक साहित्य ( वीरगाथा परक साहित्य ) ३. इतर साहित्य धार्मिक साहित्य जैन साहित्य : जैन साहित्य की अधिकांश रचनाये अपभ्रंश की है | अपभ्रंश से उत्प्पन हिंदी जैन साहित्य न केवल धार्मिक द्रस्टी से अपितु भाषा वैय्ज्ञानिक दृष्टी से भी बड़ा महत्व रखती है | जैन ग्रंथो में देवसेन का श्रावकाचार , दर्शंसर , स्वयम्भू का पयुम चारिउ आदि प्राचीन जैन काव्य माने जाते है | पयुम  चारिउ राम कथा पर आधारित है | कुछ विद्वानों ने स्वयम्भू को प्रथम जैन कवि मन है | अन्य जैन कवियो में पुष्पदंत, धनपाल, चंद्रमुनी, आदि का उल्लेख किया गया है | देव सेन ने पाने " सवाया धम्म दोहा " ग्रन्थ में  ग्रास्थ्स जीवन का वर्णन किया गया है | पुष्पदंत जैन साहित्य के प्रमुख कवि है  इन्होने डय कुमार चारिउ की रचना की 

आदि काल की परिस्थियां राजनातिक परिस्थियां , धार्मिक परिस्तिथी , सामाजिक परिस्थिति :

आदि काल की परिस्थियां  राजनातिक परिस्थियां हिंदी साहित्य के इतिहास से पूर्व गुप्ता साम्राज्य का पतन हो गया था,  भीतरी शिलालेख में आया है की  हूणों ने आक्रमण कर के पूरी धरती को हिला दिया था | गुप्त साम्राज्य के पतन के पश्चात मुख्या रूप से  पांच राजवंशो का उदय हुआ वल्लभी  कान्यकुब्ज मालवा और मगध  बंगाल  थानेश्वर                                   धार्मिक परिस्तिथी भारत  के रक्त में धार्मिकता के तत्व वैदिक काल से ही देखने को मिलते है | वेदों के पश्चात बोध धरम का उदय अपने आप में एक बहुत महत्व पूर्ण बात है , हिंदी साहित्य के आरम्भ में बोध धरम की पृष्ठभूमि ध्यान देने योग्य है जैन धरम : जैन धर्मं के प्रवर्तक महावीर स्वामी थे | इस धरम में कई आचार्य व त्रिथ्कर हुए है जिनकी संख्या २५ मानी गई है | महावीर स्वामी  ६  शाताब्ती में हुए थे और इनका निवास वैशाली था | जै...

हिंदी साहित्य का काल विभाजन

साहित्य बढती हुई नदी के समान होता है यह निरंतर विकास करता है, इसलिए उसे सही अर्थो में विभाजित नहीं किया जा सकता , किसी भी भाषा के साहित्य का इतिहास सब कालो में एक सा नहीं होता है किसी एक काल में कुछ विशेष परवर्तियअ और लक्षण दिखाई देते है फिर वे लुप्त हो जाते है , उनके स्थान पर नहीं प्रवार्तिया आ जाती है , इन्ही काल विशेष की प्रविअर्त्यो के आधार पर कालो का विभाजन हुआ है, कालो का वीर गाथा काल , भक्ति काल, रीती काल , अदि नामकरणइसी का उधाहरण है | काल विभाजन और नामकरण अद्द्यान की सुविधा के लिए आवश्यक है किन्तु इन्हें गणित की तरह नितांत वज्ञानिक और पुराण नहीं कहा जा सकता , सचाई यह है की काल विभाजन बहुत कुछ अनुमान पर आधारित होता है, यह कहना की अमुक काल अमुक तिथि अमुक समय पर प्रारंभ हुआ तथा अमुक तिथि पर समाप्त हो गया  उससे पूर्व की सभी प्रवति समाप्त हो गई तथा उससे दूसरे दिन दूसरा काल प्रारंभ हो गया  गलत होगा, वस्तुत एक काल की प्रवातियाँ दूसरे काल में अतिक्रमण करती है , जैसे की रीती काल में भक्ति की धारा की कमी नहीं थी, तथा भक्ति काल में  श्रृंगार का प्राचुर्य पाया जाता है| ...

डॉ. हजारी प्रसाद दिवेदी का हिंदी साहित्य का इतिहास

सन १९४० में हिंदी साहित्य की भूमिका के नाम से इनका इतिहास ग्रन्थ प्रकाशित हुआ ,डॉ. हजारी प्रसाद दिवेदी जी की खोज पूर्ण द्रष्टि इसमें दिखाई देती है, कई जगह पर इन्होने आचार्य शुक्ल की मान्यतो का खंडन किया है | विशेषताएं : इन्होने  अपने इतिहास में नई सामग्री नयी द्रष्टि तथा नए विचार प्रस्तुत किये है | इन्होने  सिदो तथा नाथों को उभरा है तथा कबीर व आदि संतो पर उनका प्रभाव दिखया है | आदि काल पर अलग से विस्तार पूर्वक ग्रन्थ लिखा है तथा उसे अलग से छपवा है |   आचर्य  चतुरसेन : आचर्य चतुरसेन ने हिंदी भाषा और साहित्य का इतिहास " नाम से एक बड़ा ग्रन्थ लिखा है , इस गांठ के लिखने में लेखक ने बड़ा परिश्रम किया है , उसकी भूमिका पढ़ने योग्य है विशेषताएं : इसमें भाषा ,ध्वनि , लिपि आदि पर विचार किया गया है तत्पश्चात हिंदी साहित्य की चर्चा की गई है  इन्होने हिंदी साहित्य को ७६० से माना है तथा " सरहपा " को पहला कवि माना है |   हिंदी  साहित्य का वृहत इतिहास तथा सामूहिक सहयोग के इतिहास नगरी प्रचारणी सभा ने १६ भागो में एक बहुत बड़ा इतिहास छापा है , अलग अलग भागो ...

अन्य हिंदी साहित्य के इतिहास ग्रन्थ

डॉ. राम कुमार वर्मा ने हिंदी साहित्य का आलोचनात्मक इतिहास लिखा शुक्ल जी के बाद यही अधिक महत्व का और बड़ा इतिहास ग्रन्थ है | विशेषताएं : इसमें चरण काल , धार्मिक काल, तक का वर्णन है बीच में संधि काल का भी नाम आता है,  इस इतिहास में काव्य धाराओं के नामो में परिवर्तन किया गया है, संत काव्य , प्रेम काव्य , इन्ही ने नाम दिए है  इन्होने हिंदी साहित्य के आरंभ को ६९३ ई से माना है, तथा स्वम्भू को पहला कवि माना है | इस इतिहास के पश्चात अन्य कई इतिहास  पदमलाल पुन्ना लाल , गणेश प्रशाद दिवेदी, गुलाबराय आदि के इतिहास भी प्रकाश में आये..

राम चंद्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास

राम चंद्र शुक्ल का  हिंदी साहित्य का इतिहास सन १९२१ में राम चंद्र शुक्ल का हिंदी साहित्य का इतिहास सामने आया , यह हिंदी शब्द सागर की भूमिका के रूप में लिखा गया था , उसी को बढाकर इसे इतिहास ग्रन्थ के रूप में लाया गया , इसमें १००० के लगभग कवियो लेखकों पर विचार किया गया है | हिंदी साहित्य इतिहास ग्रंथो में इस तिहास का बहुत अधिक महत्व है, विशेषताएं : इतिहास के काल विभाजन पर नवीन  द्रष्टि से विचार किया गया , उसके नामकरण और युगीन परिवेश को स्पस्ट किया गया है , तर्क पूर्ण मीमांसा द्वारा अपना निर्णय दिया गया है | सहियता की उस काल विशेष में होने वाली प्रव्तियो पर अधिक ध्यान दिया गया है | उसके सम्बन्ध में वक्तव्य देकर उसकी विवेचन की है  रचनाको के ग्रंथो का मूल्यांकन किया गया है | आचार्य शुक्ल ने अपने हिंदी साहित्य के इतिहास में आरम्भ के बहुत से कवियो को धर्म सम्बन्धी रचनाये बता कर उन्हें इसमें सम्मिलित नहीं किया है | जबकि आज उनके मूल्य को एतिहासिक संगती से पहचाना गया है | कुछ ऐसे कवियो को इसमें पहचाना गया जो पूर्व ग्रंथो में उपेक्चित रह गए थे , जायसी ऐसे ही महान कवि थे...

मिश्र बंधुओ का मिश्र बंधू विनोद

मिश्र बंधुओ का मिश्र बंधू विनोद  सन  १९१३ में क्रिशनबिहारी मिश्र और शुकदेव बिहारी मिश्र और गणेश बिहारी मिश्र नामक तीन भाइयों ने मिश्र " बंधू विनोद " नामक ग्रन्थ लिखा था, उस समाया इसको तीन भागो में निकला था बाद में इसका चोथा भाग भी प्रकाशित हुआ था, अब यह पुन दो भागो में छापकर आया है | इस ग्रन्थ में हिंदी के ५००० कवियो का वर्णन है इन्होने नवरत्नो के नाम से हिंदी के तुलसी, सुर , देव, बिहरी , भूषण , मति राम , केशव, कबीर , चंद , इन नौ कवियो को लिया , तथा हरिश्चंद की भी आलोचना की विशेषताएँ : मिश्रबंधुविनोद  में लेखकों की राजनातिक , सामाजिक , साहित्यिक , गतिविधयो के बारे में बताया है, इससे उस युग की भूमिका का स्वरूप सामने आता है | इस रचन में अनेक अज्ञात कवि प्रकाश में आये है, खोज पूर्ण विवरण कई है | इसमें ८ से आधिक खंड बनाये गए है तथा अपने वक्तव्य भी दिए गए है | इस रचन में कवियो की रचनाओ के उधाहरण तथा उनकी रचनाओ का एक अच्छा स्वरुप प्रस्तुत हुआ है | हिंदी साहित्य के इतिहास में पहली बार आलोचनात्मक द्रस्टी का प्रयोग हुआ है |